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15 अगस्त और वो बचपन की यादें

लो फिर आ गया वो दिन,
जो उन चॉकलेटों की याद दिला जाती हैं,
जिनके बहाने हम इस दिन भी स्कूल जाया करते थे,
वर्ना छुट्टियां तो उस दौर में हमे भी खूब भाते थे ।
किसी तरह यह कह कर खुद को मना लेते, की बस कुछ घंटों की बात है,
फिर हाथ में चॉकलेट और छुट्टियां, कहाँ मिलते पूरे साल एक साथ थे।
कितना अच्छा लगता अपनी साइकिल पर तिरंगा लगाना
कितना अच्छा लगता स्कूल के प्रिंसिपल की तरह,
अपने हाथों से  तिरंगे को लहराना।
एक चॉकलेट घर आता और उसमे भी बटवारा हुआ करता था,
और सुना है बड़ा भाई, अक्सर चॉकलेट घर आकर ही खाता था।
सच कहो तो 15 अगस्त के वो दिन, आज भी हमे याद हैं ।
स्कूल में पढाया जाता की तीन रंगों के मायने क्या हैं,
केसरिया रंग यादगार था वीरों के बलिदानों का,
सादा था सचाई भरा, और हरा हरे-भरे खलिहानों का,
रट-रट के ये परिभाषा इतिहास में, अव्वल नंबर भी लाया करते थे,
और तिरंगे की ड्राइंग बना, ये दिलासा जरुर दिलाते थे,
की कितना आसन है इसे बनाना, वर्ना चाइना के ड्रैगन हमें
पन्नों पर भी खूब सताते थे, अहा! वो दिन भी कितने मजेदार थे।
पर अब तो  हमसब बड़े हो गए, वो छोटी-छोटी खुशीयाँ
बचपन की कहानियों में, जाने कहाँ गुम हो गए।
अब तो स्टेटस पर 15 अगस्त पता चलता है,
धन्यवाद कहता होगा मार्क ज़ुकेरबर्ग,
क्योंकि उसे 15 अगस्त का विज्ञापन नहीं लगाना पड़ता है।

मतलब चिंगारी अबतक बुझी नहीं है, बस अंगारे बनना बाकी है
कोई जंग थोड़ी हमे लड़नी है, बस एक जुनून ही काफी है ।
चलो फिर से जय जवान जय किसान का नारा लगाते है ।
स्वदेशी अपनाकर, बेटियों को पढ़ाते है
और स्वच्छ भारत अभियान को ज़ोरों से चलाते हैं ।     
 
                                                                                               ~ कनक मिश्रा